ईरानियों के ग्रंथ ‘जेंदावेस्ता’ में असुर, देवता और देवता राक्षस क्यों हैं?
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भारत में असुर आदिवासी समुदाय के लोग हैं और वे खुद को महिषासुर के वंशज मानते हैं। उनका मानना है कि दुर्गा पूजा को वे शोक के रूप में मनाते हैं, क्योंकि उनके पुरखे (पूर्वज) महिषासुर की हत्या एक स्त्री द्वारा छल से किया गया। वे इस दिन किसी तरह के नेग दस्तूर नहीं करते। देश के कई हिस्सों में महिषासुर की पूजा भी होती है। पूर्व वर्षों की तरह, हाल ही में छत्तीसगढ़ के सर्व आदिवासी समाज ने प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा है कि दुर्गा पूजा के नाम पर महिषासुर और दशहरा के नाम पर गोंडवाना सम्राट रावण का अपमान न किया जाय। असुर समुदाय की तरह संथाल समाज में भी महिषासुर को पूर्वज माना जाता है, वहीं कोईतुर गोंड समुदाय रावण को अपना पूर्वज मानते हैं।
झारखंड आंदोलन को वैचारिक दिशा दशा दिखाने वाले चर्चित लेखक वीर भारत तलवार ने अपनी किताब “झारखंड में मेरे समकालीन” में लिखा है, “आजकल किसी भी शोषित उत्पीड़ित समुदाय को महिषासुर से जोड़ दिया जाता है। पिछड़े भी महिषासुर को अपना पुरखा मान लेते हैं, दलित भी और आदिवासी भी। एक महिषासुर इन सब अलग-अलग समुदाय का पुरखा कैसे हो सकता है? झारखंड के असुर नाम के आदिवासी समुदाय विशेष को तो और भी अधिकारपूर्वक महिषासुर से जोड़ दिया जाता है क्योंकि इसमें असुर शब्द है। लेकिन हमें महिषासुर के समुदाय विशेष के बारे में कोई निश्चित जानकारी है न असुर आदिवासियों के ऐसे किसी अतीत के बारे में जानकारी है।”
वैसे, यदि महिषासुर के विषय में ज्यादा जानकारी है ही नहीं, फिर यह समाज वर्षों से दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार क्यों दर्शाता आ रहा है? क्यों इसकी पूजा करता आ रहा है? और कैसे असुर समुदाय आज भी अस्तित्व में हैं? इन सवालों पर वीर भारत तलवार कहते हैं कि पीड़ित उत्पीड़ित समुदाय जरूर महिषासुर को माने तब भी यह सवाल बना हुआ है कि वे एक साथ दलित और आदिवासी दोनों के पुरखे कैसे हो सकते हैं? इस पर कोई प्रमाण नहीं मिलता।
भले किताबों में महिषासुर के बारे कोई प्रमाण नहीं मिले लेकिन झारखंड, मध्यप्रदेश सहित कई जगहों पर उनके नाम पर गांवों के नाम हैं। महिषासुर जो आगे चलकर ‘भैंसासुर’ हो गए. झारखंड के पलामू जिले के मनातु प्रखंड में भैंसासुर नाम का गांव है. एक भैंसासुर गांव उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के अंतर्गत पूरनपुर विधानसभा क्षेत्र में भी है.और कई जगहों पर इसके प्रमाण मिलते हैं। जो यह दर्शाता है कि लोक जीवन में वे मौजूद हैं।
वर्ष 1956 में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखे ” संस्कृति के चार अध्याय” में असुर शब्द को लेकर कई दिलचस्प बातें कही गई हैं। इस किताब के पृष्ठ 49 से 52 के बीच उल्लेख है कि कैसे आर्यों की जड़ें ईरानियों से मिलती हैं। कैसे फारसी और संस्कृत भाषा में बहुत समानता है। और क्यों ईरानियों के ग्रंथ ‘जेंदावेस्ता’ में ‘असुर’ को ‘देव’ और ‘देव’ को ‘राक्षस’ माना गया है।
रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं “18 वीं सदी तक भारत में इस तरह का कोई सिद्धात नहीं था कि आर्य इस देश के मूल निवासी नहीं हैं और आर्य व द्रविड़ दो नस्लें हैं और दोनों के पूर्वज अलग— अलग समय में इस देश में बाहर से आए। सन् 1786 ई. में सर विलियम जोन्स ने यह स्थापना रखी कि यूनानी, लातानी, गोथिक, केल्टिक, फारसी और संस्कृत, ये सभी भाषाएं किसी एक ही भाषा से विकसित हुई हैं। इस आधार पर तुलनात्मक भाषा विज्ञान का आरम्भ हुआ और विश्व की विद्वनमंडली इस अनुसंधान से चकित रह गई कि उत्तर भारत की सभी भाषाएं, पश्चमी एशिया की ज़ेंद, फारसी, पश्तो, बलूची, कुर्द और आरमीनियन भाषाएं तथा यूरोप की इटालियन, फ्रेंच, स्पेनिश, यूनानी, केल्टिक, जर्मन, अंग्रेजी, ट्यूटानिक, स्लावोनिक, लितुएनियन, लातीनी, अलबेनियन आदि भाषाएं किसी एक ही स्रोत से निकली हैं।
इन सभी भाषाएं बोलने वाले लोगों को विद्धानों ने हिंद-जर्मन, हिंद-यूरोपीय, हिंद-ईरानी अथवा केवल आर्य कहना आरम्भ किया और वे इस संधान में लग गए कि आर्यों का मूल स्थान कौन सा है। क्योंकि अन्य भाषाओं की अपेक्षा फारसी और संस्कृत का सामीप्य बहुत अधिक था, इसलिए, यह अनुमान लगाया गया कि आर्य जब अपना मूल स्थान छोड़कर अलग जाने लगे, तब, उस शाखा के लोग (जो ईरान और भारत की ओर चली थी) परस्पर अधिक दिनों तक साथ रहे। आर्यों का हिंदी-ईरानी नाम इसी शाखा की प्रमुखता के कारण पड़ा। यही कारण है कि संस्कृत और फारसी में अधिक निकट का संबद्ध है।”
वे आगे लिखते हैं ” आर्यों की हिंद-ईरानी शाखा दक्षिण रूस से निकलकर जब ईरान की ओर बढ़ी, तब ईरान पहुंचते-पहुंचते, कदाचित उसकी भी दो शाखाएं हो गई। इनमें से एक शाखा ने भारत आकर वेदों की रचना की और दूसरी शाखा ने ईरान में रहकर ‘जेंदावेस्ता’ ग्रंथ का निर्माण किया। ‘जेंदावेस्ता’ की भाषा ऋग्वेद की भाषा से मिलती-जुलती है। यह समानता केवल तत्सम शब्दों को लेकर नहीं है, प्रत्युत, दोनों भाषाओं के व्याकरण भी बहुत कुछ सामान हैं।
एक विचित्र बात है कि प्राचीन जेंद भाषा में ‘असुर’ का अर्थ ‘देवता’ और ‘देवता’ का अर्थ ‘राक्षस’ होता है। जेंद की वारिस भाषा फारसी में भी देव, प्रेत अथवा राक्षस को ही कहते हैं। किन्तु, भारत में असुर का अर्थ राक्षस और सुर का अर्थ देव या देवता रहा है। अजब नही कि जिस देवासुर-संग्राम की गाथा ने पुराणों में विकास पाया, वह आर्यों की इन्हीं दो शाखाओं के बीच लड़ा गया हो। जेंद भाषा-भाषियों का प्रधान देवता “अहुर मज़्द” था जो “असुर महत” का रूपांतरण मालूम होता है। जेंद भाषी आर्यों का मतभेद संस्कृत भाषियों से इस कारण हुआ कि देवताओं के बारे में उनकी कल्पनाएं भिन्न हो गई थी। “जेंदावेस्ता” में मित्र, वरुण, अग्नि आदि वैदिक देवताओं की तो सत्ता है पर इन्द्र को कहीं उपास्य नहीं माना गया है। “जेंदावेस्ता” में इन्द्र का समावेश उन देवों में किया गया है जो असुर नहीं हैं, जो असुर के विरोधी हैं या इस कारण घृणा योग्य है।
इस संग्राम में आर्यों के विरूद्ध केवल आर्य ही थे अथवा और लोग भी, यह कहना कठिन है। यदि मोहनजोदड़ो सभ्यता के लोग वहां थे तो अजब नहीं कि आर्यों से उनका भी संघर्ष हुआ हो। जिन लोगों को आर्यों ने दास, दस्यु, निषाद, अनास और शिशनेदेवा कहा है, उनसे आर्यों की मुठभेड़ केवल भारत आकर हुई यह बात समीचीन नहीं दिखती।
देवासुर संग्राम की जो कल्पना बाद में विकसित हुई, उसमें विष्णु बराबर देवताओं की ओर और शिव सदैव असुरों की ओर थे। इसका कारण क्या था? शिव की पूजा के चिन्ह मोहनजोदड़ो में मिलते हैं। उस सभ्यता के निर्माता (यदि द्रविड़ थे तब भी नहीं थे तब भी) पंजाब से लेकर मेसोपोटामिया तक फैले हुए थे। इन इलाकों में कई प्रकार के अन्य लोग भी रहे होंगे , जिनका अब इतिहास नहीं मिलता। आर्यों का संघर्ष इन सभी लोगों से हुआ था, जिसकी प्रतिध्वनि वैदिक साहित्य में अत्यन्त परिवर्तित ढंग से सुनाई पड़ती है।”
बहुत बढ़िया । जय जोहार ।