ना कहना कि तब पता ही नहीं चला!

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घर को जा रही थी सर पर टोकरा डाल कर,

सोचा नदी किनारे थोड़ा वक़्त गुज़ार लूँ ।

छोटी के साथ इतना खेली, इतना खेली,

कि समय का तब पता ही नहीं चला ।।

 

घर जाकर बाबा के साथ झूला झूलकर,

सोचा माँ के हाथ का खाना खा लूँ ।

बात करते-करते, छोटी कंधे पर सो गई,

सपने हम दोनों देख रहे थे, यह तब पता ही नहीं चला ।।

 

घर पहुंची तो देखा, माँ पोटली बांध रही थी,

सोचा माँ से उसका कारण पूछ लूँ ।

माँ ने बोला कि हम नए घर को जा रहे हैं,

मैं नासमझ थी, उन बातों का मतलब तब पता ही नहीं चला ।।

 

उस दिन बाबा को पहली बार रोता देखा,

सोचा आज मैं भी थोड़ा रो लूँ ।

पैरों से ज़मीन, सर से छत छिना,

इन बातों की गहराई का तब पता ही नहीं चला ।।

 

आज फिर अपने घर को बचाना है,

सोचा कि लोगों से मदद मांग लूँ ।

जल, जंगल, ज़मीन और ज़िम्मेदारी जितनी मेरी है उतनी है आपकी भी,

भूलोक के अंत के बाद ना कहना कि तब पता ही नहीं चला ।।


फोटो – adivasiinfo.net 

Anima Kerketta

Anima Kerketta belongs to Khadia tribe and is a native of Bagdogra, West Bengal. She has done her Masters of Arts in Social Work from Tata Institute of Social Sciences, Mumbai. Currently, she is working for Kudumbashree NRO, an organization working in the domain of Women Empowerment, Poverty Eradication and Building Livelihoods through Enterprise Promotion throughout the nation.

2 thoughts on “ना कहना कि तब पता ही नहीं चला!

  • August 12, 2020 at 11:44 am
    Permalink

    Sab pata chal gaya ….. bahut hi dil ko chchulenewali kavita hai ….. Anima ko johar aur Zindabad ✊✊

    Reply
  • June 14, 2021 at 8:57 pm
    Permalink

    What a remarkable poetry ❤

    Reply

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