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उसने देखा उपर

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उसने देखा उपर
छत था न छतरी
जमीन पर लचार पिता पड़े थे
इक आस बंधी थी आंखों में
कोई तो आएगा…

सुना था उसने
नहीं होता कोई
तो
सरकार होता है उसका
हर लेगी उसके दुःख दर्द
पता कहाँ था उसे!
सरकारी थोथी पोथी में नहीं होता
आत्मियता और इन्सानियत

दिल्ली की सख्त जमी से जूझती कच्ची उम्र अचानक बड़ी हो गयी
और
बोली अब्बा से
यहाँ कुछ रहा नहीं अब्बू
यहाँ की मिट्टी मर गयी है
मर गया है उसका
इन्सानियत भी

अब्बू की निस्तेज आंखों में हिम्मत से झांकते हुए बोली
चलो अब्बू अब चलते हैं यहाँ से
काफी जगह है वहाँ
वहाँ की मिट्टी जिंदा हैं
जिंदा हैं बुआ ताई ताऊ
कह उसने
पिता को बैठाया साईकल पर
और
चल दिए वहाँ से…


फोटो: दीपा केरकेट्टा, सुखरीखाड़, सरगुजा, छत्तीसगढ़


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Jyoti Lakra

ज्योति लकड़ा झारखंड के गढ़वा जिले के कुटकु डैम से विस्थापित कुरुख़ आदिवासी परिवार से हैं. उनका परिवार पहले खेती पर निर्भर था, लेकिन अभी उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में बतौर मजदूर के रूप में कार्यरत हैं. वे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अर्थव्यवस्था की त्रासदियों से जूझ रहे आदिवासी दुनिया की पीड़ा को अपनी कहानियों और कविताओं के माध्यम से उकेरती हैं. इन्हें फर्स्ट “रमणिका पुरस्कार सम्मान” 2019 से सम्मानित किया गया था. इनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं.

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