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कोरोना लॉक डाउन का आदिवासियों पर प्रभाव

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फ़ोटो : तुरी समुदाय का एक व्यक्ति 1996 में बांस की टोकरी बुनता हुआ. (बीजू टोप्पो द्वारा)


COVID-19 महामारी से निपटने के लिए केंद्र एवं झारखंड सरकार द्वारा लिए गए निर्णय जिनमें विषेषाधिकार के तहत 70 दिनों  (22 मार्च से 31 मई 2020) का लॉकडाउन किया गया है. इसका स्थानीय आदिवासियों पर प्रभाव क्या पड़ा है, इसे समझने के लिए झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम जिला एवं गढ़वा जिले के आदिवासी बहुल प्रखण्ड भण्डरिया और पोटका के भूमिज एवं उराँव समुदाय के लोगों से बातचीत के आधार पर कुछ गंभीर पहलु सामने आते हैं. 

समुदाय के लोगों का कहना है कि, अभी सरहुल पर्व का समय है. इस बार हम सामूहिक रूप सरहुल नहीं मना पा रहे हैं. गांव का अखड़ा सूना है.”

विभिन्न आदिवासी समुदाय इस पर्व को लेकर बहुत से अनुष्ठान करते हैं जो लॉक डाउन के कारण नहीं हो पा रहे हैं. बीमार और विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत रूप से दूरी बनायी जाती है. पर नोवेल कोरोना वायरस से प्रभावित व्यक्ति के साथ अपराधी जैसा बर्ताव किया जा रहा है. सामाजिक दूरी ब्राह्मणवाद की पुनरावृति है. यह हमें लगभग पांच हज़ार साल और पीछे वर्ण व्यवस्था की ओर ले जाएगी.

जिस गति से पृथ्वी गर्म हो रही है और उसके कंपन में इजाफे को देखा जा सकता है इससे निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि आदिवासियों के साथ ही उन सभी सुविधा प्राप्त लोगों को भी उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा जितना कि वंचित तबके को.

आदिवासी बिहड़ अरण्य प्रदेश में अपने समुदाय के लोगों के साथ युगों से रहते आये हैं. जहरीले कीड़े मकोड़ों और सांपों बिच्छूओं से बचने के लिए वे ग्रीष्मकाल में जड़ी बूटी और अपना पारंपरिक ज्ञान अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करते हैं. यह प्रशिक्षण तीन महीने का होता है. यह कहते हुए एक बुजुर्ग ने निराषा भरे षब्दों में कहा, “लगता है इस वर्ष यह प्रशिक्षण नहीं हो पायेगी.”

झारखण्ड का 29.5 प्रतिशत क्षेत्र वनों से आछान्दित है. हमारा जीवन वन और वनोपज पर आधारित है. इस वर्ष हम लोग महुआ नहीं उठा पाए. महुआ हमारे ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की रीढ़ है. जिस समय महुआ गिरना आरम्भ हुआ ठीक उसी समय लॉक डाउन की घोषणा की गयी. यहाँ लॉक डाउन के बाद बड़गड़, बरकोल आदि क्षेत्रों में सुरक्षा बलों से लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी है, जो उन्हें जंगल भी नहीं जाने दे रहे. लेकिन, पुलिस और सी. आर. पी. एफ. के जवानों को क्या पता कि महुआ झुण्ड बनाकर नहीं उठाते? केंदु पत्ता का सरकारी लीज फरवरी में देना था जो नहीं हो सका. ग्रामीण इस वर्ष जंगल से एक पैसा भी नहीं जोड़ पाए हैं.  

इस ग्रष्मकालीन सीजन में चिरौंजी फल से आदिवासी अपनी कमाई में रू. 60-70 हजार जोड़ लेते थे, इससे बरसात में खेती-बारी करने के समय बहुत सहयोग मिलता था. इस बार चिरौंजी का बाजार नहीं हुआ. इसी तरह केंदू फल से भी लोग एक दिन में एक टोकरी केंदू बेच कर रू. 250-300 कमाते थे, इस बार उससे भी कोई कमाई नहीं हुई.

लाह उत्पादन के क्षेत्र में झारखण्ड का स्थान अग्रणी रहा है. इस वर्ष भी बहुत सारे पेड़ों पर लाह का उत्पादन किया गया है जिनमे बेर, कुसुम, पलास के पेड़ हैं. इन पेड़ों की पत्तियां निकल आयी हैं. लाह का कीड़ा जब तैयार हो जाता है तब इसे पेड़ से उतार कर लाह को दूसरे पेड़ों में लगाना होता है, अगर यह काम जल्दी नहीं किया गया तब लाह कीड़े उड़ने लगते हैं. लाह लगाने का समय लगभग तीन दिनों का होता है, अगर इस बार हम लाह नहीं लगा पाए तो हमारा बहुत नुकसान हो जाएगा. लाह को बेचने के लिए समय पर इसे बाजार न मिली तो यह मिट्टी के भाव भी नहीं बिक पाएगा. इस सीजन में लगभग ढाई से तीन लाख रूपये की कमायी लाह से हो जाती है. यदि सरकार लाह उत्पादक किसानों को संरक्षण दे तो झारखण्ड लाह उतपादन एवं उससे बने उत्पाद का बड़ा केंद्र बन सकता है. जिससे बड़े पैमाने पर महिलाओं, और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा.

सामुहिकता और मददईत व्यवस्था के बारे में बात करने पर पूर्वी सिंहभूम के पोटका के एक व्यक्ति ने बताया कि “लाॅक डाउन के कारण हम लोग इस बार अपने गांव के जलाषयों से हक से मच्छली मार कर नहीं खा पाए. हम लोग सामुहिक तौर पर मच्छली पकड़ते हैं. इस कारण इस वर्ष इन तलाबों की सफाई नहीं हो पाएगी. अगला लीज पता नहीं किसे मिलेगा.” (लीज खत्म होने और नए लीज मिलने के बीच के समय गांव के लोग सामुहिक रूप से मच्छली पकड़ते हैं यह समय लगभग एक से दो माह का होता है.)

पूर्वी सिंहभूम के पोटोमदा गांव के एक व्यक्ति ने बताया कि सब्जी की खेती और मौसमी फलों की बिक्री हम नहीं कर पा रहे हैं. हमारे यहां कटहल, केंद, चार, भेंलवां, पपाया, भिण्डी, बोदी, टमाटर, लौकी, झिंगी-नेनुआ मिर्चा और साग है. हम लोगों के पास इसका कोई खरीदार नहीं आया है. इस बार सब्जी की खेती भी गयी. गरमा धान और रबी फसल भी लॉक डाउन और बारिश से प्रभावित हुई है. इन्हें काटने के लिए नहीं पहुॅच पाने के कारण दाना झड़ने लगा है. इसके बाद अब बरखा-पानी भी हो गयी है, जिसके कारण बीज अंकुरित हो सड़ रहे हैं. सरकार के कोई स्पष्ट आदेश नहीं होने के कारण हम लोगों को कटाई-मिसाई में दिक्कत हो रही है.

आदिवासियों का जीवन आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समरसता आधारित है. अदिवासी गांव की आर्थिक संरचना एक दूसरे समुदाय को मजबूती प्रदान करती है. जतरा-मेला हाट-बजार पर लॉक डाउन के प्रतिकूल प्रभाव को स्पस्ट रूप से देखा जा सकता है.  हाट-बजार बंद होने से वे अपने चीजों की अदला बदली और जरूरत के अनुसार सामान नहीं खरीद पा रहे हैं. अभी कृषि कार्य हेतु वे नया काड़ा और बाछा खरीद कर उसे निघारते हैं ताकि खेती के वक्त इन नये मवेषियों से खेतों की जुताई की जा सके. आदिवासी सरहूल के बाद कृषि कार्य आरंभ कर देते हैं पर इस वर्ष वे लोग पीछे पड़ गये है. खेतों में गोबर खाद डालना है और जुताई करनी होती है तभी धान का बीज खेतों पर बिचड़ा के लिए डाला जाता है. पहाड़ी जमीन होने के कारण बरसात का पानी नहीं रूक पाता है. इस तरह अगर समय पर काम नहीं हुआ तो खेती की ताक सम्भालना मुश्किल भरा होगा.

आदिवासियों में कुछ समुदाय ऐसे भी हैं जो खेती से कोई वास्ता नहीं रखते हैं, वे अपनी कारीगरी से आजीविका चलाते हैं. इनमे मुख्यतः लोहरा, कोरवा, बिरिजिया, बाथुड़ी, बड़ाईक समाज के अलावे वे अपने आस-पास निवास करने वाले गैर-आदिवासी समुदायाों के साथ भी गांव के अंदर एक साथ निवास करते हैं, जिनमें कुम्हार, घांसी, चमार, और चिक आदि जातियों का महत्वपूर्ण स्थान है. लोहरा कृषि कार्य हेतु लोहे के औजार बनाता है. कोरवा, बिरिजिया बांस के सामान, जिनमें सूप, दउरा, टोकरी बासन, रस्सी इत्यादि बनाते हैं. कुम्हार मिट्टी के बर्तन और खपड़ा बनाते हैं तो घासी और चमार गांव के मरे जानवरों की खाल से विभिन्न प्रकार के जूत, रस्सी, एवं वाद्य यंत्र एवं बनाते और बेचते हैं. शादी जैसे समारोह में ढोल मंदर बजाते हैं. आदिवासियों के घरों में शादी के समय इन समुदायों का बड़ा योगदान रहता है. कुम्हार घड़ा और मिट्टी के बर्तन देते हैं जिनमें पीने का पानी और हड़िया बनाने और हड़िया पीने के मिट्टी के पात्रों का उपयोग किया जाता है. चिक बड़ाईक के यहां से कपड़ों की खरीदारी की जाती है. लॉक डाउन के कारण सामाजिक समरसता और सहभागिता प्रभावित हुई है.

नोवेल कोरोना वायरस से प्रभावित व्यक्ति के साथ अपराधी जैसा बर्ताव किया जा रहा है. सामाजिक दूरी ब्राह्मण वाद की पुनरावृति है. यह हमें लगभग पांच हज़ार साल और पीछे वर्ण व्यवस्था की ओर ले जाएगी.

एक ओर सरकार पूंजी आधारित बाजार व्यवस्था को पोषित कर रही है वहीं दूसरी ओर आदिवासी समुदायों को ताकत के रूप में उभरने नहीं देना चाहती है, उनके पास जो भी विशेषाधिकार हैं उससे उन्हें वंचित किया जा रहा है. लॉक डाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव यदि किसी को पड़ा है तो वे हाशिये पर खड़े मिजदूर, किसान और आदिवासी लोग ही हैं जिनके विषेषाधिकारों पर सत्ता सेंध लगाती रहती है. 

ध्यातव्य हो कि जिस गति से पृथ्वी गर्म हो रही है और उसके कंपन में इजाफे को देखा जा सकता है इससे निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि आदिवासियों के साथ ही उन सभी सुविधा प्राप्त लोगों को भी उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा जितना कि वंचित तबके को. आदिवासी समुदाय के आस-पास निवास करने वाले दूसरे समुदाय के लोग, जिनसे उनका परस्पर अंतर संबंध है, भी इस तरह लॉक डाउन के कारण प्रभावित हुए हैं.  

11 मार्च 2020 को डब्लू एच ओ के द्वारा जब COVID-19 को  महामारी घोषित किया गया. इसके बाद भारत सरकार ने 22 मार्च 2020 से लेकर 31 मई 2020 तक चार चरणों में शट डाउन किया पर सरकार के पास इस आपदा से निपटने के लिए कोई पूर्व तैयारी नहीं थी. इस महामारी से समाज के सबसे सम्पन्न लोगों पर इसका प्रभाव अल्प काल के लिए ही हो सकता है पर आदिवासियों पर इसका दीर्धकालीन प्रभाव दिखाई देगा. इस लिए सरकार को चाहिए कि वे गांव को आर्थिक धुरी के तौर पर विकसित करें. मनरेगा एवं दाल भात योजनाओं के साथ ही युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उनके घर के निकट व्यवस्था की जाये.

वैष्विक अर्थ तंत्र एवं पर्यावरण में जिस तेजी के साथ बदलाव हो रहे हैं, उससे निकट भविष्य में ऐसी और बहुत सी चुनौतियां हमारे सामने आने वाली हैं जिसके लिए हमें इस महामारी से सबक लेने की जरूरत है. आदिवासी, प्रकृति के सबसे नजदीक रहने वालों में हैं. जिस गति से पृथ्वी गर्म हो रही है और उसके कंपन में इजाफे को देखा जा सकता है इससे निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि आदिवासियों के साथ ही उन सभी सुविधा प्राप्त लोगों को भी उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा जितना कि वंचित तबके को. अतः वैष्विक नीतियों में बदलाव के मद्देनजर भारत जैसे विकासशील देशों को अपने गांव को प्राथमिकता से मजबूती देने की नीति पर काम करना होगा तभी हम आत्म निर्भर बन सकते हैं.



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Jyoti Lakra

ज्योति लकड़ा झारखंड के गढ़वा जिले के कुटकु डैम से विस्थापित कुरुख़ आदिवासी परिवार से हैं. उनका परिवार पहले खेती पर निर्भर था, लेकिन अभी उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में बतौर मजदूर के रूप में कार्यरत हैं. वे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अर्थव्यवस्था की त्रासदियों से जूझ रहे आदिवासी दुनिया की पीड़ा को अपनी कहानियों और कविताओं के माध्यम से उकेरती हैं. इन्हें फर्स्ट “रमणिका पुरस्कार सम्मान” 2019 से सम्मानित किया गया था. इनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं.

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