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पेड़ -लताओं के हुल

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अब जंगल -पर्वतों में
पलाश फूल खिला है
लाल अति सुन्दर
जैसे कोई
हुल का आग
जलाया है

देश के हर कोने में
जंगल -पर्वतों के
पेड़ -लताएं
अब खड़े हुए हैं
सर ऊँचा कर
बन्द मुट्ठी को
आसमान की ओर
दिखाकर
मनुष्यों को होशियार कर रहे हैं

जो षड़यन्त्र चल रहा है
उन्हे उजाड़ने की
मनुष्यों के मन में
श्रेष्ठ होने की जो चाहत
फल -फूल रहा है
उसके खिलाफ ही
पेड़ और लताएं
हुल का आरम्भ किया है
सिदो-कान्हुोँ
के जैसा हुल
इसलिए तो
अब

पहाड़-पर्वतों के
पेड़ -लताओं मे
हुल के रंग
लाल लगा हुआ है|


फोटो : Soumava Roy

Chandramohan Kisku

दक्षिन पूर्व रेलवे में कार्यरत चंद्रमोहन किस्कु की संताली भाषा में एक कविता पुस्तक "मुलुज लांदा" साहित्य अकादेमी दिल्ली से प्रकाशित हो चुकी है। वे संताली से हिंदी, हिंदी से संताली, बांग्ला से संताली में परस्पर अनुवाद करते हैं और अखिल भारतीय संताली लेखक संघ के आजीवन सदस्य हैं।

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